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  • September 30, 2020

अर्द्धनारीश्वर

जी हां ! यह शब्द किसी पौराणिक कथाकार, मूर्तिकार, नर्तक, संगीतज्ञ या ऋषि मुनि के मन की कपोल कल्पना नही है| ये अपने आप में एक पूरे विज्ञान की थ्योरी को समेटे हुए है| आज इस ब्लाग के माध्यम से हम अर्द्धनारीश्वर और इसके हमारे जीवन में वैज्ञानक महत्व के बारे में समझने की कोशिश करेंगे|

अर्धनारीश्वर का अर्थ – सृष्टि के निर्माण के लिए, शिव ने अपनी शक्ति को स्वयं से अलग किया। शिव स्वयं पुरूष लिंग के द्योतक हैं तथा उनकी शक्ति स्त्री लिंग की द्योतक हैं | पुरुष (शिव) एवं स्त्री (शक्ति) का एका होने के कारण शिव नर भी हैं और नारी भी, अतः वे अर्धनारीश्वर कहलाए जाते हैं।

अर्धनारीश्वर के अस्तित्व में आने की कहानी –

जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि को बनाने का कार्य आरंभ किया तब उन्होंने पाया कि उनकी रचनाएँ अपने एक निश्चित समय तक जीवन जीने के बाद स्वयं नष्ट हो जाएंगी तथा हर बार उन्हें नए सिरे से फिर से सृष्टि का निर्माण करना पड़ेगा|

उस समय तक सृष्टि में स्त्री का निर्माण नहीं हुआ था, ब्रह्मा नारी को प्रकट करने में असमर्थ थे, इसलिए जब वे इस विषय में काफी सोच विचार करने के बाद भी किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाए। तब अपनी समस्या के समाधान के लिए वे शिव की शरण में पहुँचे। उन्होंने शिव को प्रसन्न करने हेतु कठोर तप किया। ब्रह्माजी के कठोर तप से शिव प्रसन्न हुए। ब्रह्माजी की समस्या के सामाधान हेतु शिव अर्धनारीश्वर स्वरूप में प्रकट हुए। आधे भाग में वे शिव थे तथा आधे में शक्ति|

इसी अर्धनारीश्वर रूप में शिवजी ने ब्रह्माजी को मैथुनी सृष्टि का रहस्य समझाने के लिए अपने शरीर में स्थित देवी शक्ति के अंश को पृथक कर दिया| जिससे उनके शरीर से नर और नारी भाग अलग हो गये। बाद मे उनकी इसी मैथुनी सृष्टि से संसार की वृद्धि तेजी से हुई। नर और नारी की इसी ऊर्जा का मिलन सभी सृजन का आधार है। इसलिए शिव और शक्ति एक साथ मिलकर इस ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं| अर्धनारी रूप से यह भी पता चलता है कि भगवान शक्ति के महिला सिद्धांत को भगवान शिव के पुरुष सिद्धांत से कभी अलग नहीं किया जा सकता|

शिव और शक्ति का संबंध- शक्ति , शिव की अविभाज्य अंग हैं। शिव नर के स्वरूप हैं तो शक्ति नारी की। दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। शिव के बिना शक्ति का अथवा शक्ति के बिना शिव का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

  • शिव अकर्ता हैं। वो संकल्प मात्र करते हैं; शक्ति संकल्प सिद्धी करती हैं|
  • शिव कारण हैं; शक्ति कारक।
  • शिव संकल्प करते हैं; शक्ति संकल्प सिद्धी।
  • शक्ति जागृत अवस्था हैं; शिव सुसुप्तावस्था।
  • शक्ति मस्तिष्क हैं; शिव हृदय।
  • शिव ब्रह्मा हैं; शक्ति सरस्वती।
  • शिव विष्णु हैं; शक्त्ति लक्ष्मी।
  • शिव महादेव हैं; शक्ति पार्वती।
  • शिव रुद्र हैं; शक्ति महाकाली।

शिव सागर के जल के सामान हैं तथा शक्ति लहरों के सामान हैं। लहर है जल का वेग। जल के बिना लहर का क्या अस्तित्व है?

और वेग बिना सागर अथवा उसके जल का?

यही है शिव एवं उनकी शक्ति का संबंध।

अर्द्धनारीश्वर और हम – लेकिन अगर आप सच में इस अर्द्धनारीश्वर के गूढ़ रहस्य के पीछे छिपे उस भाव को समझना चाहते हैं, जिसको समझाने के लिए शिव अर्धनारीश्वर के रूप में अवतरित हुए तो हमें शिव के इस रूप को गहराई से समझना पड़ेगा।

अर्धनारीश्वर का अर्थ यह भी हुआ कि आपका ही आधा व्यक्तित्व आपकी पत्नी और आपका ही आधा व्यक्तित्व आपका पति हो जाता है। आपकी ही आधी ऊर्जा नारी और आधी पुरुष हो जाती है। और तब इन दोनों के बीच जो रस और लीनता पैदा होती है , उस शक्ति का कहीं कोई विसर्जन नहीं होता, वो अमर होती है।

बायोलाजिस्ट के अनुसार , हर व्यक्ति दोनों है – हर व्यक्ति बाई सेक्सुअल है। वह आधा पुरुष है , आधा स्त्री है। और होना भी चाहिए , क्योंकि आप पैदा एक स्त्री और एक पुरुष के मिलन से ही तो हुए हैं। तो आधे – आधे आपको होना ही चाहिए। अगर आप सिर्फ मां से पैदा हुए होते , तो स्त्री होते ; सिर्फ पिता से पैदा हुए होते , तो पुरुष होते। लेकिन आप में पचास प्रतिशत आपके पिता और पचास प्रतिशत आपकी मां के गुण मौजूद है। तो आप आधे – आधे होंगे ही – अर्धनारीश्वर होंगे। जीवविज्ञान ने तो अब खोजा है इधर पचास वर्षों में , लेकिन हमने अर्धनारीश्वर के स्वरूप में , आज से कम से कम पचास हजार साल पहले , इस धारणा को स्थापित कर दिया। और यह धारणा किसी योगी के अनुभव के आधार पर खोजी गई है ।

कोई भी योगी जब भीतर लीन होता है , तब पाता है कि मैं दोनों हूं – प्रकृति भी और पुरुष भी ; मुझमें दोनों मिल रहे हैं ; मेरा पुरुष मेरी प्रकृति में लीन हो रहा है ; मेरी प्रकृति मेरे पुरुष से मिल रही है ; उनका आलिंगन अबाध चल रहा है। मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं कि आप आधे पुरुष हैं और आधे स्त्री। आपका चेतन पुरुष है , आपका अचेतन स्त्री है। अगर आपका चेतन स्त्री का है , तो आपका अचेतन पुरुष है। जगत द्वंद्व से निर्मित है , इसलिए आप दो होंगे ही। आप बाहर खोज रहे हैं स्त्री को , क्योंकि आपको भीतर की स्त्री का पता नहीं। आप बाहर खोज रहे हैं पुरुष को , क्योंकि आपको भीतर के पुरुष का पता नहीं।

और इसीलिए , कोई भी पुरुष मिल जाए , तृप्ति न होगी , कोई भी स्त्री मिल जाए , तृप्ति न होगी। क्योंकि भीतर जैसी सुंदर स्त्री बाहर पाई नहीं जा सकती।

और आपके पास , सबके पास , एक ब्लू प्रिंट है। वह आप जन्म से लेकर घूम रहे हैं। इसलिए आपको कितनी ही सुंदर स्त्री मिल जाए , कितना ही सुंदर पुरुष मिल जाए , थोड़े दिन में बेचैनी शुरू हो जाती है। लगता है कि बात बन नहीं रही। इसलिए सभी प्रेमी असफल होते हैं। वह जो प्रतिमा आप भीतर लिए हैं , वैसी प्रतिमा जैसी स्त्री आपको अगर कभी मिले , तो शायद तृप्ति हो सकती है। लेकिन वैसी स्त्री आपको कहीं मिलेगी नहीं। उसके मिलने का कोई उपाय नहीं है। क्योंकि जो भी स्त्री आपको मिलेगी , वह किन्हीं पिता और मां से पैदा हुई और उन पिता और मां की प्रतिछवि उसमें घूम रही है। आप अपनी प्रतिछवि लिए हुए हैं हृदय के भीतर। जब आपको अचानक किसी को देखकर प्रेम हो जाता है , तो उसका कुल मतलब इतना होता है कि आपके भीतर जो प्रतिछवि है , उसकी छाया किसी में दिखाई पड़ गई , बस। इसलिए पहली नजर में भी प्रेम हो सकता है , अगर किसी में आपको वह बात दिखाई पड़ गई , जो आपकी चाह है – चाह का मतलब , जो आपके भीतर छिपी स्त्री या पुरुष है – किसी में वह रूप दिखाई पड़ गया , जो आप भीतर लिए घूम रहे हैं , जिसकी तलाश है। प्रेम अपने उस जुड़वां हिस्से की तलाश है , जो खो गया ; जब मिल जाएगा , तो तृप्ति होगी।

अंत में बस यही कहना चाहूंगी कि अर्द्धनारीश्वर हम सभी में विराजमान हैं|जरूरत है अपने भीतर तलाशने की, क्योंकि जब तक आप अपने भीतर के उस स्त्री या पुरुष को महसूस नहीं कर पाएंगे , आप किसी भी प्रेम संबंध में खुश नहीं रह पाएंगे|

क्योंकि यही अर्द्धनारीश्वर ही हमें अपने साथी के साथ पू्र्णता और आनंद का अहसास दिलाएगा|
धन्यवाद |

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