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  • November 30, 2020

चल उड़ जा रे पंछी!

*क्योंकि हर गीत कुछ कहता है!

जब यूं लगे कि मानो मुट्ठी से सब रेत की तरह छूट रहा !
जब यूं लगे कि जीवन में अब कुछ शेष नहीं!
जब यूं लगे कि अंत में बस यही तो सत्य है!
जब यूं लगे कि सब उम्मीदें दम तोड़ चुकी!
जब यूं लगे कि दोबारा मिलने की कोई सूरत नहीं!
जब यूं लगे कि स्वाभिमान से अब और समझौता न हो पाएगा!
जब यूं लगे कि अंतत: नियति को शायद यही स्वीकार है!

बस तभी ज़हन में बरबस ही यह गीत तैर जाता है , ‘चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देस हुआ बेगाना!’

सन् 1957 में जहां एक ओर ऊंचे आसमान में पतंगे उड़ रही थी तब वहीं दूसरी ओर ‘भाभी’ फिल्म के एक दृश्य में भी हालातों का मारा एक बेबस पंछी घर से बेघर होकर उड़ने को मजबूर था!फिल्म में यह गीत बलराज साहनी और नंदा के जीवन संदर्भ में फिल्माया गया था और फिल्म में कई बार आता है!
कहते हैं कि कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनके बोल रूह तक पहुंच, अपना ठिकाना बना, सदा के लिए वहीं बस जाते हैं,तो यह गीत भी उन्हीं में से एक है!
यह गीत हमें जीवन के उस कटु सत्य से रूबरू करा हमें यह अहसास दिला जाता है कि यह निराश और टूटे मन का पंछी मोह के पिंजरें से निकल न जाने कब ,कहां और कैसे उड़ जाए कहा नहीं जा सकता!
यह गीत कहीं न कहीं हमें जीवन के क्षण भंगुर होने का अहसास भी करा जाता है क्योंकि आज इस महान गीत के रचयिता राजेंद्र कृष्ण, संगीतकार चित्रगुप्त , गायक मोहम्मद रफी और बलराज साहनी सभी हमसे दूर जा चुके हैं!
मोहमम्द रफी द्वारा गाए टाप 10 गानों में से यह भी एक है!

गाहे-बगाहे आज भी यह गीत एफ.एम या टीवी पर देखने-सुनने को मिलता रहता है! और हमें बरबस ही यह अहसास दिला जाता है कि कुछ भी तो सदा वैसा नहीं रहता जैसा हम उसे सदा से देखते हैं.
अभी हाल ही में मेरे पिता ने मुझसे जब इस गीत के विषय पर बात की तो बताया कि किस प्रकार उस समय यह गीत लड़की की विदा से लेकर हर समारोह का हिस्सा हुआ करता था! सुबह फेरों के बाद जब कोई दुल्हन विदा कराई जा रही होता तो साऊंड सिस्टम वालों को खास हिदायत दी जाती कि भई वो ‘चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना’ गीत वाला रिकार्ड लगा दो! मानो कि यह गीत न बजता तो उनकी लाड़ली जो आज दुखीमन से , पंख फड़फड़ाते, बिल्कुल किसी पंछी की ही तरह अपना घोंसला छोड़कर जा रही थी, की विदाई अधूरी और बेरौनक ही रह जाती थी!
वैसे तो इस गीत में गांव-देहात का ऐसा कोई खास ज़िक्र नहीं है . लेकिन फिर भी यह गीत शहरों की अपेक्षा गांवों में ज्यादा लोकप्रिय हुआ. या यूं भी कह सकते हैं कि शायद गांवों के लोग शहरों के लोगों के मुकाबले कुछ ज्यादा ही संवेदनशील, भावुक और ज़मीन से जुड़े होते हैं जो हर चीज़ को अधिक गहराई से सोचते हैं!
सुना है कि तब लंबी बीमारी का दर्द झेलते किसी उम्रदराज़ व्यक्ति के अंतिम वक्त में भी यह गीत चला दिया जाता था. गीत सुनकर वह व्यक्ति अपने बीते सुखद पलों को याद कर अपने अंतिम पड़ाव की यात्रा के दर्द में कुछ राहत महसूस कर पाता था.
देखा जाए तो यह पूरा गीत ही दर्द की एक बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति करता है लेकिन इस गीत के कुछ ऐसे शब्द हैं जो हर व्यक्ति को अपनी ही जीवन व्यथा सुना कर गले लगाकर ढांढस बंधा, इस गीत में छिपे मर्म को उभारकर सामने लाते हैं और सुनने वाला भीतर तक व्यथित होकर एक अजब सी पीड़ा से भर जाता है, जैसे कि पंछी, प्राण-पखेरू , ठिकाना, मेले, माली और बेगाना आदि!
इस गीत के प्राण इसके हृदयस्पर्शी बोल में ही छिपे हैं . तिस पर रफी के बेहद पीड़ादायक स्वर और इसके संगीत को जीवंत करती तबले की थाप इसे एक कालजयी गीत बना देती है.
इस गीत के विषय में एक खास बात शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि इस गीत को पहले तलत महमूद की आवाज़ में रिकार्ड किया गया था लेकिन इस गीत की आत्मा की मांग के अनुसार जो विस्तार और वेदना अापेक्षित थी वह न मिल पाई. बाद में मोहम्मद रफी की आवाज़ ने इस गीत की आत्मा के साथ न्याय करते हुए जिस प्रकार गाया वह पीड़ा और उनकी आवाज़ की गूंज का ब्रहमांडीय विस्तार आजतक अमर है.
तो पढि़ए इस गीत को और खो जाइए यादों के पुराने गलियारों में-

चल उड़ जा रे पंछी, के अब ये देश हुआ बेगाना !
खत्म हुए दिन उस डाली के, जिस पर तेरा बसेरा था,
आज यहां और कल हो वहां, ये जोगी वाला फेरा था,
ये तेरी जागीर नहीं थी, चार घड़ी का डेरा था,
सदा रहा है इस दुनिया में किसका आबोदाना.
चल उड़ जा रे पंछी !
तूने तिनका तिनका चुनकर, नगरी एक बसाई
बारिश में तेरी भीगी पांखें, धूप में गर्मी खाई
गम न कर जो तेरी मेहनत, तेरे काम न आई
अच्छा है कुछ ले जाने से, देकर ही कुछ जाना
चल उड़ जा रे पंछी!
भूल जा अब वो मस्त हवा, वो उडऩा डाली डाली,
जग की आंख का कांटा बन गई, चाल तेरी मतवाली
कौन भला उस बाग को पूछे हो न जिसका माली,
तेरी किस्मत में लिखा है जीते जी मर जाना
चल उड़ जा रे पंछी!
रोते हैं सब पंख पखेरु साथ तेरे जो खेले
जिनके साथ लगाए तूने अरमानों के मेले
भीगी आँखों से ही उनकी आज दुआंए ले ले
किसको पता है इस नगरी में कब हो तेरा आना
चल उड़ जा रे पंछी!

कहा जाए तो यह गीत किसी भी प्रकार के अंत के लिए ही लिखा गया था!
यह हर उस मोह रूपी पंछी का गीत है जो अपने निर्मोही माया रूपी घोंसले से मोहभंग कर जबरन उड़ने को विवश है!
लेकिन गीत सुनने के बाद न जाने क्यों इस पंछी के प्रति मोह और दया का भाव पैदा हो जाता है, कलेजा फटने लगता है और लगता है कि कैसे न कैसे, कोई न कोई जुगत लगा कर इस पंछी को जाने से रोक लिया जाए क्योंकि इसका यूं हमें छोड़कर जाना दिल को मंजूर नहीं शायद!
~Sugyata
Song credits – https://youtu.be/k-DjzlY64GM


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