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  • October 26, 2021

एक पत्र सासु(माँ) के नाम पार्ट -१

मुझे अच्छी तरह से याद है , आज से करीब दस साल पहले जब पापा ने मेरा हाथ सुनील के हाथों में ये कहते हुए दिया था आपसे के ” समधन जी , फूलों सी कोमल है मेरी बेटी , थोड़ी भावुक है ,पर दिल की नेक है , इससे कभी कोई भूल-चूक हो जाये तो माफ़ करना ” तब माँ आपने प्यार से मेरे सर पर हाथ फ़ेरते हुए उनसे कहा था ” मेरी कोई बेटी नहीं है समधी जी , इसे में बहुँ नहीं बेटी की तरह रखूंगी , बेटी बनाकर ले जा रही हूँ।” तब मुझे ऐसा लगा था जैसे मुझ बिन-माँ की बच्ची को माँ मिल गयी हो , बड़ा सुकून मिला था जब आपने मुझे “बेटी ” कहा था , और शायद वो पहली और आखरी बार था , खैर हर पिता की तरह मेरे पापा ने  भी नम आँखों से मुझे विदा किया और मैं भी खुद को संभालते हुए  आने वाले नए जीवन के लिए मन ही मन तैयार करने लगी थी , पर क्या पता था की यह तो तूफ़ान आने से पहले की शांति नहीं , तूफान के आने का संकेत था ,पर मैं समझ न सकी।

मेरा गृह- प्रवेश हुआ घर मेहमानों से भरा था , और हो भी क्यों न हो , नयी बहुँ के स्वागत के लिए ।आप किचन में सोई तो मुझे लगा मेरी सास को मेरी कितनी फिक्र है की  ” नई-नई बहुँ आई है उसे थोड़ा आराम करने दु “पर मैं गलत थी ,आप घर में आये मेहमानों भर को जताना चाहती थी के आप कितनी अच्छी है , और मैं पागल आपके पीछे -पीछे आ गई कहने के “मैं किचन मे सो जाती हूँ माँ  , आप आराम से रूम में जाकर सो जाइये” पर आप नहीं मानी , आपने कहा “बस कुछ देर पैर दबा दे , नींद आ जाएगी ” पता नहीं मुझे क्या सुझा के मैंने भी आपको अपनी “माँ ” समझ कर आपकी बात मान ली पर ये सब करने के पीछे की आपकी मंशा मैं आज़ जान पाई हूँ , जब बहुत देर हो चुकी है।खैर, जैसे तैसे करके सुनील से लड़ते झगड़ते ही सही कुछ महीने तो निकल गए।

उसके बाद शुरू हुआ जीवन का नया अध्याय जहा कई चुनौतियाँ इंतज़ार में थी मेरे ।जब आपकी मासी के बेटे की शादी थी और मैं ऑफिस से सीधे शादी में आई तो आपने ये कहकर मेरा सब मेहमानों के सामने अपमान किया के ” तू तो भूत बनकर आई है रे ,बहुँ “फिर भी मैं बस चुप-सी आपको सुनती रही और आपके चेहरे पर सास का ओहदा पाकर अपनी पहली विजय पताका फ़हराने की ख़ुशी साफ़ नजर आ रही थी माँ , उसके बाद तो आये दिन कभी आप मेरे रहन -सहन तो कभी मेरी भाषा , कभी मेरे बोल- चाल तो कभी मेरे खाना बनाने , घर के सामान लाने, , कभी मेरे बाल बनाने पर , साड़ी  पहनने पर , किसी से बात कर लेने पर , कपड़ें धोने पर , तो कभी आटा गूंथने पर यहां तक झाड़ू -पोंछा और न जाने कितनी ही बातो में मीन -मेख़ निकालती फिर भी सब नकार कर चेहरे पर जबरदस्ती की ख़ुशी रखकर भी बस मुस्कुराती रही की कभी तो आप मुझे समझेंगी  कभी तो आप मेरी सासु – माँ नहीं बल्कि (माँ ) बनेंगी ।

मैं तो बस आपकी बेटी की , और मेरी “माँ “की कमी को मेरे प्यार और सेवा से भरना चाहती थी । पर हद तो तब हो गई जब मेरे ऑफिस के लिए रवाना होते ही आप अपने बेटे को मेरे खिलाफ करने लगी थी माँ , मैं शायद मानती भी नहीं अगर अपनी आँखों से न देखा होता और कानों से सुना नहीं होता ।उस दिन शायद कुछ भूल गई थी मैं घर के दरवाजें पर पहुंची ही थी की आपकी आवाज़ सुनाई दी ,पर ध्यान से सुना तो आँखें भर आई थी मेरी , जैसे घर के बाहर ही खड़ी -खड़ी ठंडी पड़  गई थी मैं तो   आप कह रही थी “संस्थिता को अपनी मुट्ठी में रखना सुनील ,लगाम कस के रखना ,नहीं तो सिर पर चढ़ जाएगी कही , याद रहे , उसके पापा से बात न कर पाए और पीहर के किसी भी सदस्य से बात न कर सके वो कभी “।और हैरान तो तब थी जब सुनील ने आपको समझाने की बजाय आप ही का साथ दिया मैं नहीं कहती की हर बहुँ अच्छी होती है , पर दुनिया को देख आप अपने घर में वही सब बिना सोचे-समझे करे  ये कहा की समझदारी है “माँ”,मैं तो बस “माँ चाहती थी , “माँ ” का प्यार चाहती थी आपसे बस ये भी कुछ ज्यादा मांग लिया था क्या माँ मैंने आपसे ।

 

मुझे याद है जब मैं माँ बनने वाली थी , मेरी जीवन की सबसे बड़ी ख़ुशी मिलने वाली थी मुझे ,उस हालत में भी आपने मुझसे २८ किलों का बिछावन धुलवाया ये कहकर  की ” बिछावन सही से निचोड़ा  नहीं है बहुँ ,तूने” और बेटे आपके खड़े -खड़े सुन रहे थे बस , घर के काम करने में मुझे कोई शर्म नहीं थी माँ , पर ऐसी हालत में भी जान बुचकर मेरा काम आप बढ़ा देती थी तब बहुत दुःख होता मुझे जब भी आपसे या सुनील से प्यार से बात करनी चाही तो या तो आप दोनों या तो  बात का रुख मोड़ देते या फिर कोई न कोई बहाना बना मेरी बात अनसुनी कर देते थे हमेशा ।गर्भावस्था  की हालत में भी आप घंटो काम करवाती मुझसे , घंटों मुझे भूखा रखती थी आप, पूरा घर धुलवाती और कितनी ही बाते जो शायद लिखते -लिखते मैं ही रो पड़ूँगी पर आज़ मैं सब कुछ कहना चाहती हूँ आपसे ।उस हालत में जब आराम की जरूरत थी तो मैं गहरे तनाव  और सदमे में थी माँ ,और मेरे साथ मेरे बच्चा भी पर आपको न मेरी फिक्र थी न आने वाले नन्हें से मेहमान की |

यह था पत्र का पहला भाग , पत्र का अंतिम और दूसरा भाग भी जल्द ही लेकर आउंगी आपके समक्ष |आपकी प्रतिक्रियाओं का सदैंव इंतज़ार रहेगा , पाठकगणों।मेरा यह ब्लॉग  पसंद आया तो “लाइक” , “कमैंट्स ” जरूर करें।

©️®️अंजली व्यास

 

Anjali

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