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  • April 18, 2021

मन

खुद के सिवा न कोई संगी !
मन होता भई बड़ा दुरंगी !

किसी पराए को जा अपनाता
कभी अपनों को पराया कर जाता !
मन ये भईया बड़ा दुरंगी !

जब चाहे दोस्त को गैर बनाता
कभी जा पुराने बैरी को गले लगाता
मन ये भईया बड़ा दुरंगी !

प्यार में चाहे तो दुनिया लुटाता
कभी उसी दुनिया को मिट्टी में मिलाता
मन ये भईया बड़ा दुरंगी !

माया की ऊँची नगरी बसाता
कभी उसी नगरी को आग लगाता
मन ये भईया बड़ा दुरंगी !

मोह में बंधने की तरकीब जुटाता
कभी वही बंधन तोड़ भाग जाता
मन ये भईया बड़ा दुरंगी !

किसी के गुण पर रीझ-रीझ जाता
कभी उन्हीं गुणों को धता बताता
मन ये भईया बड़ा दुरंगी !

सुख के दिनों में कलपता रहता
कभी दुखों में भी मौज उड़ाता
मन ये भईया बड़ा दुरंगी !

जब प्यार मिले तो चिढ़ सा जाता
कभी प्यार बांटने को अकुलाता
मन ये भईया बड़ा दुरंगी !

लगे प्यास तो बुझाने नदी तक जाता
कभी बादल बन सागर की प्यास बुझाता
मन ये भईया बड़ा दुरंगी !

भरे मेले में भी अकेला पड़ जाता
कभी अकेले में सपनों की दुनिया सजाता
मन ये भईया बड़ा दुरंगी !

जहां लग जाए वहीं धूनी रमाता
कभी उखड़ जाए फिर लौट कर न आता !
मन ये भईया बड़ा दुरंगी !
तभी तो खुद के सिवाय
इसका कोई न संगी !
~Sugyata
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